सार्वजनिक गजेटियर में कटियारी का कोई एक “संस्थापक पुरुष” वाला वृत्तांत नहीं मिलता। सरयूपारीण वंशावली-सारांशों में जो बात बार-बार आती है, वह यह है कि यह गाँव श्री मुख शाण्डिल्य शाखा के बारह मूल गाँवों में गिना जाता है। यह त्रि-प्रवर गोत्र है, जिसमें शाण्डिल्य, असित और देवल का स्मरण होता है। इस परंपरा में सामवेद की कौथुम शाखा से भी संबंध बताया जाता है।
इस पंक्ति में तिवारी और त्रिपाठी एक ही उपाधि के दो रूप हैं। यह विद्वत्ता की उपाधि है, कोई अलग जाति नहीं।
सरयूपारीण पहचान
सरयूपारीण (सरयूपारी) ब्राह्मण कन्यकुब्ज मूल के वे समूह हैं, जो सरयू के पूर्व में — गोरखपुर, देवरिया, बस्ती और आस-पास — केंद्रित हैं। पारंपरिक कथा उन्हें अयोध्या में राम-रावण युद्ध के बाद दान न स्वीकार करने और सरयू पार जाकर बसने से जोड़ती है। यह समुदाय की परंपरा है, पुरातत्त्व की तिथि नहीं। इससे नदी केवल भूगोल नहीं रहती; वह पहचान का अंग बन जाती है।
बारह मूल गाँव
श्री मुख शाण्डिल्य तिवारी सूची में प्रायः ये नाम आते हैं:
- सांडी
- सोहगौरा
- सनरायन
- सृजन / सिरजम
- धतूरा
- भगरैच
- बलुआ
- हरदी
- झुडियान
- उनवलिया
- लोनापार (अक्सर लोनाखर, कनापार, छपरा सहित)
- कटियारी
नामों की वर्तनी स्थान-स्थान पर बदलती है। देवरिया तहसील के सिरजम खास को कभी सृजन से जोड़ा जाता है। बाद की शताब्दियों में परिवार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल तक फैले, पर विवाह और कर्मकांड में मूल गाँव का नाम रखते रहे।
घराने
श्री मुख शाण्डिल्य के भीतर चार घराने बताए जाते हैं — राम, कृष्ण, नाथ और मणि। इनका संबंध सोहगौरा (गोरखपुर) के नामित पूर्वजों से जोड़ा जाता है। गोत्र-बहिर्विवाह और जाति-अंतर्विवाह के साथ घराना सगे-संबंधियों की दूरी तय करने का सूक्ष्म पता है। ये आपस में प्रतिद्वंद्वी जातियाँ नहीं हैं।
कटियारी में गर्ग मुख
परंपरा यह भी कहती है कि महत्वपूर्ण केंद्रों में गर्ग मुख शाण्डिल्य तिवारी श्री मुख पंक्ति के साथ बसते रहे। बताए गए मार्गों में वैवाहिक भूमि-दान (संकल्प / बिरत) और उपजाऊ नदी-किनारे पर बाद में आकर बसना शामिल है। एक ही उपनाम होने से मुख का भेद विवाह-नियमों के लिए मिट नहीं जाता।
पड़ोसी ब्राह्मण गाँव
कटियारी पैना, परसिया मिश्र, परसिया देवर और अहिरौली तिवारी जैसे गाँवों के घेरे में है। ये संबंध विवाह, बाढ़ और भूमि से जुड़े रहे हैं। शास्त्रीय सूचियाँ शाण्डिल्य तिवारियों को गौतम मिश्रों (और पास के कुछ दुबे परिवारों) से जोड़ती हैं। ये कथाएँ वंशावली की हैं। जब तक किसी परिवार की पंजी यहाँ न आ जाए, इन्हें उसी रूप में पढ़ना चाहिए।
यह पृष्ठ क्या नहीं कहता
यहाँ कोई काल्पनिक स्थापना-वर्ष नहीं दिया गया है। महाकाव्य की मूल-कथा को जनगणना का तथ्य नहीं बनाया गया। कोसल, गुप्त / गहड़वाल काल और 1946 तक का औपनिवेशिक गोरखपुर — यह क्षेत्रीय पृष्ठभूमि है, कटियारी का पूरा गाँव-इतिहास अभी नहीं।