यह प्रविष्टि रंगून गए प्रवासियों और गाँव में रह गए उनके परिवारों की साझा स्मृतियों के लिए है। इससे जुड़ी कटियारी की व्यक्तिगत कहानियाँ अभी संकलित की जानी हैं।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में बर्मा में रोज़गार की माँग बढ़ी। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से लोग वहाँ श्रमिक, दरबान, लिपिक तथा अन्य पदों पर काम करने गए। 1942 के जापानी आक्रमण के बाद बड़ी संख्या में लोगों को भारत लौटना पड़ा।
इन घटनाओं का क्षेत्रीय इतिहास प्रवास वाले लेख में दिया गया है। कटियारी के प्रवासियों के नाम, काम और यात्राओं के विवरण परिवारों की जानकारी तथा उपलब्ध दस्तावेज़ों के आधार पर जोड़े जाएँगे।